20 मार्च को कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद 23 मार्च को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शपथ ली थी। प्रदेश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है, जब किसी मुख्यमंत्री ने बिना मंत्रिमंडल के इतने दिन तक सभी जिम्मेदारियां अकेले संभाली हों। रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी कहा था कि ये कैसी सरकार है, जिसमें इस संकट के समय में स्वास्थ्य मंत्री तक नहीं हैं।
इन लोगों को मिल सकता है मंत्री पद
तुलसी सिलावट, इमरती देवी, प्रद्युम्न सिंह तोमर, महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रभुराम चौधरी, गोविंद सिंह राजपूत के अलावा कांग्रेस छोड़कर आए एंदल सिंह कंसाना और हरदीप सिंह डंग, राजवर्धन सिंह दत्ती गांव और बिसाहू लाल सिंह को मंत्री बनाया जा सकता है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले बाकी अन्य 12 विधायकों को भी निगम मंडलों में एडजस्ट किया जाएगा।
अपनों को मनाना सबसे मुश्किल काम
मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री समेत 35 मंत्री रह सकते हैं। जो 26 नेता शपथ लेंगे, उनमें अगर 10 सिंधिया समर्थकों को मंत्री बनाया जाता है तो इसके बाद बचे हुए 16 स्थानों के लिए भाजपा अपने विधायक दल में से दावेदारों को चुनेगी। इन 16 चेहरों का चुनाव ही सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि मंत्रिपद के कई दावेदार हैं। कई पुराने चेहरे भी इस बार कतार में हैं। भाजपा के सामने अपनों को मनाना सबसे ज्यादा मुश्किल काम होगा।
क्षेत्रीय संतुलन साधने की कवायद
शिवराज की नई सरकार में सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कवायद होगी। क्षेत्रीय स्तर पर प्रदेश के सभी संभागों से मंत्री बनाने के साथ सामाजिक समीकरण के स्तर पर क्षत्रिय, ब्राह्मण, पिछड़े, अनुसूचित जाति और आदिवासी समाज को प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना है। मगर कहीं-कहीं भौगोलिक संतुलन बिगड़ रहा है। सागर जिले की ही बात करें तो वहां से गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह के साथ गोविंद सिंह राजपूत भी कैबिनेट में शामिल होने वाले तीसरे दावेदार बन गए हैं। यही हाल रायसेन जिले का है। यहां से प्रभुराम चौधरी के साथ रामपाल सिंह भी मंत्री बनने की दौड़ में हैं। सभी को जगह देना शिवराज के लिए चुनौती है।